Corona par kavita: dabe paav aaya parivartan | कोरोना पर कविता : दबे पांव आया परिवर्तन
दबे पांव आया परिवर्तन
पुनःपनपते पंख प्रकृति के,
दिखा रहे दुनिया को दर्पण ।
दबे पांव आया परिवर्तन।
मानव कुल शोकाकुल होकर
त्राहि-त्राहि कर रहे विचरते।
काल कोरोना शोर मचाकर,
भेज रहा है नाश - निमंत्रण।
दबे पांव आया परिवर्तन।
वर्षों से चुपचाप प्रकृति,
अब फिर से हुंकार कर रही।
उसके होठों की हरियाली
मंद-मंद मुस्कान कर रही।
लगी झूमने धरा बावरी
मूढ़ मनुज का करके तर्पण।
दबे पांव आया परिवर्तन।
जंगल जंगल नगर बनाया
मंगल गया अमंगल छाया
घायल प्रकृति,कुपित प्रकृतीश्वर
अंत नहीं अब लेगा क्षणभर
मूक-प्रलय करता है गर्जन
दबे पांव आया परिवर्तन।
बड़ी बड़ी तकनीकि लगाई
बड़े बड़े उद्योग लगाए
बड़े बड़े जितने पशु उनको
बिठा दिया खोला चिड़िया-घर
इसीलिए आया परिवर्तन
दबे पांव आया परिवर्तन।
मानव अब मानव- घर बैठा
देख रहा प्रकृति परिवर्तन
वैद्य, वैज्ञानिक व्याकुल होकर,
ढूंढ रहे -है कहाँ नियंत्रण?
मानो पुनर्जन्म लेने को,
बदल रहा काया परिवर्तन
दबे पांव आया परिवर्तन।
-avinash gupta
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