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Nature's revenge | प्रकृतीश्वर का प्रतिशोध

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धू धू कर जल रही , चिता है, आज प्रकृति की। देख ! धरा शमशान हो रही , आज विकृत सी। मैं विचलित सा देखूं ?  या फिर शोक मनाऊं? या फिर तन पर  इस विनाश की  भष्म लगाऊं? स्वार्थ पूर्ति करने का लक्ष्य ले  दुनिया भूली। बना दिया सुंदर धरती को  तुमने शूली। ये मत भूलो मैं महेश,  मैं ही महीश हूँ,  एक त्रिशूली। वह दिन दूर नहीँ हे मानव! प्रलय तुम्हें दिखलाऊँ। तेरे रक्त की प्यासी जिह्वा बनके , मै ललचाऊँ। नील कंठ जिसके हित बन कर  विष पी डाला। विष वापस कर  आज उसे विषपान कराऊँ। ©hindikebol

भ्रष्टाचार

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हे भूप भारत ! आज दीन-हीन कैसे हो रहा? हे सूर्य! तेरा तेज क्षीण कैसे हो रहा? कांटो से निकलकर था अभी पुष्प एक खिला, कि पंखुड़ियों ने अपनी ही विद्रोह कर दिया। हंस भी न खिला ही था खिला कि रो रहा। हे पुष्प तेरा सोचनीय रूप लग रहा। राम, कृष्ण, परशुराम शस्त्र हैं तेरे। महावीर ,बुद्ध ,आदि अस्त्र हैं तेरे। गांधी, सुभाष ,भगत आदि भक्त हैं तेरे। आज सत्यता पर अत्याचार हो रहा। कपूत-कंस, क्लेश-पूत पैदा हो रहे हैं ,आज पिता अग्रसेन का है धैर्य खो रहा। नहीं है एक दुर्योधन, दुःशाशन, द्रौपदी न एक, न जाने कितनी द्रौपदियों का लाज खो रहा! नहीं है कोई सत्य-नेत्र वाला गुणी देश भक्त अब तो हर प्रजेश ही धृतराष्ट्र हो रहा था स्वर्ग जहां नर्कता का भास हो रहा कैसे करूँ बात सभ्य शिष्ट एक समाज की? भ्रष्टाचार चारोंओर आज हो रहा।