Nature's revenge | प्रकृतीश्वर का प्रतिशोध


revenge of nature

धू धू कर जल रही ,
चिता है,
आज प्रकृति की।
देख ! धरा शमशान हो रही ,
आज विकृत सी।

मैं विचलित सा देखूं ? 
या फिर शोक मनाऊं?
या फिर तन पर 
इस विनाश की
 भष्म लगाऊं?

स्वार्थ पूर्ति करने का लक्ष्य ले
 दुनिया भूली।
बना दिया सुंदर धरती को
 तुमने शूली।

ये मत भूलो मैं महेश, 
मैं ही महीश हूँ, 
एक त्रिशूली।


वह दिन दूर नहीँ हे मानव!
प्रलय तुम्हें दिखलाऊँ।
तेरे रक्त की प्यासी जिह्वा बनके ,
मै ललचाऊँ।

नील कंठ जिसके हित बन कर
 विष पी डाला।
विष वापस कर 
आज उसे विषपान कराऊँ।

©hindikebol

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