ह मे शुरू से ही यही सिखाया जाता है कि कुछ बनिए ,कुछ प्राप्त कीजिए, कुछ नया करिए, कुछ देखिए, कुछ सीखिए यह सब अच्छा है लेकिन कुछ सीख कुछ बनते हुए कुछ नया प्राप्त करते हुए कुछ नया करते हुए कुछ नया देखते हुए कुछ नया सीखते हुए हम काफी कुछ इकट्ठा कर लेते हैं इतना इकट्ठा कर लेते हैं की हमें याद ही नहीं रहता कि हमने क्या इकट्ठा कर लिया है समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जब हमें इकट्ठा की हुई चीजों में से कुछ को छोड़ना पड़े और क्योंकि पूरे जीवन भर हमने कभी छोड़ना तो सीखा ही नहीं हमेशा चीजों को विचारों को आदतों को स्वभाव को लोगों को यादों को जहां जो कुछ भी अच्छा लगा इकट्ठा करते रहे। इकट्ठा करना तो व्यक्ति को आरम्भ से ही आता रहा है । जैसे बच्चो द्वारा फूल तोड़ना, खिलौने इकठा करना। समाज और शैक्षिक संस्थाओं का कार्य होना चाहिए कि कुछ बड़ा बनना ही न सिखाए बल्कि कुछ छोड़ना भी सिखाए। आज हम ऐसी कितनी ही चीजों के बारे में जानते हैं जिनको यदि छोड़ पाते तो जीवन सरल हो सकता था। लेकिन छोड़ नहीं पाये। छोड़ना भी एक कला है सबको नहीं आता। समय मिले तो अवश्य सीख लें। अन्यथा वो दिन आसान नहीं होगा जब न चाहते हुए ...
Comments
Post a Comment