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कोयले की सुंदरता

   न दी धरातल को नापकर व्यापक हो जाती है । वायु प्राण देकर व्यापक हो शीतल हो जाती है। बीज अंधकार और तपन से अंकुरित हो जाता है ।......... @hindikebol.blogspot.com

The art of leaving । छोड़ने की कला

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ह मे शुरू से ही यही सिखाया जाता है कि कुछ बनिए ,कुछ प्राप्त कीजिए, कुछ नया करिए, कुछ देखिए, कुछ सीखिए यह सब अच्छा है लेकिन कुछ सीख कुछ बनते हुए कुछ नया प्राप्त करते हुए कुछ नया करते हुए कुछ नया देखते हुए कुछ नया सीखते हुए हम काफी कुछ इकट्ठा कर लेते हैं इतना इकट्ठा कर लेते हैं की हमें याद ही नहीं रहता कि हमने क्या इकट्ठा कर लिया है समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जब हमें इकट्ठा की हुई चीजों में से कुछ को छोड़ना पड़े और क्योंकि पूरे जीवन भर हमने कभी छोड़ना तो सीखा ही नहीं हमेशा चीजों को विचारों को आदतों को स्वभाव को लोगों को यादों को जहां जो कुछ भी अच्छा लगा इकट्ठा करते रहे। इकट्ठा करना तो व्यक्ति को आरम्भ से ही आता रहा है । जैसे बच्चो द्वारा फूल तोड़ना, खिलौने इकठा करना। समाज और शैक्षिक संस्थाओं का कार्य होना चाहिए कि कुछ बड़ा बनना ही न सिखाए बल्कि कुछ छोड़ना भी सिखाए। आज हम ऐसी कितनी ही चीजों के बारे में जानते हैं जिनको यदि छोड़ पाते तो जीवन सरल हो सकता था। लेकिन छोड़ नहीं पाये।  छोड़ना भी एक कला है सबको नहीं आता। समय मिले तो अवश्य सीख लें। अन्यथा वो दिन आसान नहीं होगा जब न चाहते हुए ...

Corona par kavita: dabe paav aaya parivartan | कोरोना पर कविता : दबे पांव आया परिवर्तन

 दबे पांव आया परिवर्तन  पुनःपनपते पंख प्रकृति के,  दिखा रहे दुनिया को दर्पण ।   दबे पांव आया परिवर्तन। मानव कुल शोकाकुल होकर  त्राहि-त्राहि कर रहे विचरते। काल कोरोना शोर मचाकर, भेज रहा है नाश - निमंत्रण। दबे पांव आया परिवर्तन। वर्षों से चुपचाप प्रकृति, अब फिर से हुंकार कर रही। उसके होठों की हरियाली मंद-मंद मुस्कान कर रही। लगी झूमने धरा बावरी मूढ़ मनुज का करके तर्पण। दबे पांव आया परिवर्तन। जंगल जंगल नगर बनाया मंगल गया अमंगल छाया घायल प्रकृति,कुपित प्रकृतीश्वर अंत नहीं अब लेगा क्षणभर मूक-प्रलय करता है गर्जन दबे पांव आया परिवर्तन। बड़ी बड़ी तकनीकि लगाई बड़े बड़े उद्योग लगाए बड़े बड़े जितने पशु उनको बिठा दिया खोला चिड़िया-घर इसीलिए आया परिवर्तन दबे पांव आया परिवर्तन। मानव अब मानव- घर  बैठा देख रहा प्रकृति परिवर्तन वैद्य, वैज्ञानिक व्याकुल होकर, ढूंढ रहे -है कहाँ नियंत्रण? मानो पुनर्जन्म लेने को, बदल रहा काया परिवर्तन  दबे पांव आया परिवर्तन। -avinash gupta

Nature's revenge | प्रकृतीश्वर का प्रतिशोध

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धू धू कर जल रही , चिता है, आज प्रकृति की। देख ! धरा शमशान हो रही , आज विकृत सी। मैं विचलित सा देखूं ?  या फिर शोक मनाऊं? या फिर तन पर  इस विनाश की  भष्म लगाऊं? स्वार्थ पूर्ति करने का लक्ष्य ले  दुनिया भूली। बना दिया सुंदर धरती को  तुमने शूली। ये मत भूलो मैं महेश,  मैं ही महीश हूँ,  एक त्रिशूली। वह दिन दूर नहीँ हे मानव! प्रलय तुम्हें दिखलाऊँ। तेरे रक्त की प्यासी जिह्वा बनके , मै ललचाऊँ। नील कंठ जिसके हित बन कर  विष पी डाला। विष वापस कर  आज उसे विषपान कराऊँ। ©hindikebol

भ्रष्टाचार

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हे भूप भारत ! आज दीन-हीन कैसे हो रहा? हे सूर्य! तेरा तेज क्षीण कैसे हो रहा? कांटो से निकलकर था अभी पुष्प एक खिला, कि पंखुड़ियों ने अपनी ही विद्रोह कर दिया। हंस भी न खिला ही था खिला कि रो रहा। हे पुष्प तेरा सोचनीय रूप लग रहा। राम, कृष्ण, परशुराम शस्त्र हैं तेरे। महावीर ,बुद्ध ,आदि अस्त्र हैं तेरे। गांधी, सुभाष ,भगत आदि भक्त हैं तेरे। आज सत्यता पर अत्याचार हो रहा। कपूत-कंस, क्लेश-पूत पैदा हो रहे हैं ,आज पिता अग्रसेन का है धैर्य खो रहा। नहीं है एक दुर्योधन, दुःशाशन, द्रौपदी न एक, न जाने कितनी द्रौपदियों का लाज खो रहा! नहीं है कोई सत्य-नेत्र वाला गुणी देश भक्त अब तो हर प्रजेश ही धृतराष्ट्र हो रहा था स्वर्ग जहां नर्कता का भास हो रहा कैसे करूँ बात सभ्य शिष्ट एक समाज की? भ्रष्टाचार चारोंओर आज हो रहा।