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Nature's revenge | प्रकृतीश्वर का प्रतिशोध

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धू धू कर जल रही , चिता है, आज प्रकृति की। देख ! धरा शमशान हो रही , आज विकृत सी। मैं विचलित सा देखूं ?  या फिर शोक मनाऊं? या फिर तन पर  इस विनाश की  भष्म लगाऊं? स्वार्थ पूर्ति करने का लक्ष्य ले  दुनिया भूली। बना दिया सुंदर धरती को  तुमने शूली। ये मत भूलो मैं महेश,  मैं ही महीश हूँ,  एक त्रिशूली। वह दिन दूर नहीँ हे मानव! प्रलय तुम्हें दिखलाऊँ। तेरे रक्त की प्यासी जिह्वा बनके , मै ललचाऊँ। नील कंठ जिसके हित बन कर  विष पी डाला। विष वापस कर  आज उसे विषपान कराऊँ। ©hindikebol

Mahisasura Mardini stotra ka arth | महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र का अर्थ

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अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१॥ भावार्थ:   हे हिमालय पर्वत की पुत्री (पार्वती) ! धरती को आनंदित करने वाली, संसार को पुलकित करने वाली, नंदी के द्वारा वंदित, पर्वत राज विंध्याचल के शीश पर निवास करने वाली , विष्णु को आनंदित करने वाली । इंद्र के द्वारा पूजित हे भगवति !  आप नील कंठ भगवान शिव की भार्या हैं । आपका कुटुम्ब (परिवार) बहुत विशाल है। आप कल्याण करने वाली हैं । हे महिषासुर दैत्य का अंत करने वाली ! जिनके केश अत्यंत रम्यक (मनोहर) हैं, आप शैल पुत्री हैं । आपकी जय हो । आपकी जय हो। सुरवर वर्षिणि दुर्धर धर्षिणि दुर्मुख मर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिष मोषिणि घोषरते । दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥२॥   भावार्थ:  सुरपति इंद्र को समृद्ध देने वाली। दुर्धर नामक दैत्य या ऐसी बाधा जिसका अंत करना अत्यंत दुष्कर है, का अ...